बॉम्बे हाईकोर्ट ने दिवंगत अभिनेता सुशांत सिंह राजपूत की पूर्व मैनेजर दिशा सालियान की मौत के मामले में बुधवार को जांच केंद्रीय जांच ब्यूरो (CBI) को सौंप दी। जस्टिस सारंग कोतवाल और जस्टिस रंजितसिंहा भोंसले की खंडपीठ ने दिशा के पिता सतीश सालियान की याचिका पर सुनवाई करते हुए यह आदेश दिया ।
हालांकि, हाईकोर्ट ने यह भी स्पष्ट किया कि जांच अधिकारी को किसी व्यक्ति के खिलाफ पर्याप्त सामग्री मिलने तक उसे आरोपी के तौर पर नहीं देखा जाना चाहिए। अदालत ने सीबीआई के जांच अधिकारी को यह भी निर्देश दिया कि यदि जांच में संज्ञेय अपराध बनता है तो जल्द-से-जल्द आरोपपत्र दाखिल किया जाए। वहीं यदि जांच में कोई संज्ञेय अपराध सामने नहीं आता है तो सक्षम अदालत के समक्ष उचित तरीके से मामला बंद करने की कार्रवाई की जाए।
अदालत ने सीबीआई को निर्देश दिया है कि वह जांच के लिए एक वरिष्ठ और अनुभवी अधिकारी नियुक्त करे।
सतीश सालियान ने मुंबई पुलिस की जांच पर सवाल उठाते हुए अपनी बेटी की मौत को लेकर स्वतंत्र जांच की मांग की थी। उन्होंने आरोप लगाया था कि दिशा के साथ गैंगरेप के बाद उसकी हत्या की गई। हालांकि, मुंबई पुलिस अब तक यह दावा करती रही है कि दिशा की मौत 14वीं मंजिल से गिरने के कारण हुई थी।
आदेश उस सुनवाई के बाद आया है जिसमें बॉम्बे हाईकोर्ट ने मुंबई पुलिस की अब तक की जांच पर कई गंभीर सवाल उठाए थे। अदालत ने पुलिस की लंबी चली जांच को लेकर बेहद कड़ी टिप्पणी की थी और कहा था कि अगर इतने वर्षों तक जांच चली तो उसका कानूनी महत्व क्या रह जाता है। अदालत ने यह भी कहा था कि केवल दुर्घटनावश मृत्यु रिपोर्ट (एडीआर) की प्रक्रिया के जरिए लंबे समय तक मामले को चलाना पर्याप्त नहीं हो सकता।
पुलिस ने दिशा की मौत के बाद सीआरपीसी की धारा 174 के तहत एडीआर दर्ज किया था। इस प्रावधान के तहत आत्महत्या, दुर्घटना या संदिग्ध परिस्थितियों में हुई मौत की प्रारंभिक जांच की जाती है। कोर्ट ने सवाल किया था कि यदि परिवार की ओर से हत्या और गैंगरेप जैसे संज्ञेय अपराधों के आरोप लगाए गए थे तो फिर नियमित एफआईआर दर्ज करके आपराधिक जांच क्यों नहीं शुरू की गई।
अदालत ने शुरुआती जांच में सीसीटीवी फुटेज को लेकर भी सवाल उठाए। कोर्ट के सामने यह बात आई कि उस स्थान को सीधे तौर पर कवर करने वाला सीसीटीवी फुटेज उपलब्ध नहीं था, जहां से दिशा के गिरने की बात कही गई। इसके अलावा कुछ गवाहों के बयानों में दरवाजे के लॉक होने को लेकर विसंगतियां सामने आईं। अदालत ने गौर किया कि जहां गवाहों ने दरवाजा लॉक होने की बात कही, वहीं पंचनामा में दरवाजे को नुकसान पहुंचने या जबरन खोले जाने के कोई स्पष्ट निशान दर्ज नहीं थे।
मामले की सुनवाई के दौरान दिशा सालियान के पोस्टमार्टम को लेकर भी सवाल उठे। अदालत के सामने कहा गया कि राज्य की गाइडलाइन के अनुसार ऐसे मामलों में पोस्टमार्टम दो डॉक्टरों की मौजूदगी में किया जाना चाहिए, जबकि दिशा का पोस्टमार्टम कथित तौर पर एक डॉक्टर ने किया था। रिपोर्ट के मुताबिक पोस्टमार्टम मौत के तीन दिन बाद किया गया था। इसमें सिर, हाथ, पैर और छाती पर चोटों का उल्लेख था और सिर की चोट को जानलेवा बताया गया था। रिपोर्ट में नाक और मुंह से खून आने का भी उल्लेख था। हालांकि, रिपोर्ट में यौन हमले या रेप के कोई प्रमाण नहीं पाए जाने की बात दर्ज थी।
दिशा सालियान की मौत 8 जून 2020 को मुंबई के मलाड इलाके में एक ऊंची इमारत की 14वीं मंजिल से गिरने के बाद हुई थी। यह घटना सुशांत सिंह राजपूत की मौत से महज कुछ दिन पहले हुई थी।
सतीश सालियान ने पिछले वर्ष हाईकोर्ट का रुख करते हुए अपनी बेटी की मौत के मामले में एफआईआर दर्ज करने की मांग की। उन्होंने आरोप लगाया कि उनकी बेटी के साथ सामूहिक दुष्कर्म के बाद उसकी हत्या की गई। हालांकि, पुलिस ने इन आरोपों से संबंधित किसी अपराध को साबित करने वाला पर्याप्त साक्ष्य मिलने से इनकार किया।
सतीश सालियान के वकील निलेश ओझा ने अदालत में आरोप लगाया कि मुंबई पुलिस ने परिवार को पोस्टमार्टम रिपोर्ट तक उपलब्ध नहीं कराई और हाईकोर्ट का दरवाजा खटखटाने के करीब पांच साल बाद रिपोर्ट उपलब्ध कराई गई। उन्होंने यह भी सवाल उठाया कि दिशा के पिता द्वारा जिन लोगों के नाम लिए गए, उनके खिलाफ एफआईआर क्यों नहीं दर्ज की गई। अदालत ने भी इस बात पर ध्यान दिया था कि पोस्टमार्टम रिपोर्ट और एडीआर की प्रतियां दिशा के परिवार को उसकी मौत के पांच साल बाद तक उपलब्ध नहीं कराई गई थीं।
महाराष्ट्र सरकार की ओर से पेश मुख्य सरकारी वकील शिशिर हिराय ने अदालत में कहा कि पुलिस की जांच में ऐसा कोई ठोस सबूत नहीं मिला, जिसके आधार पर किसी व्यक्ति के खिलाफ हत्या का मुकदमा चलाया जा सके। उनके मुताबिक उपलब्ध परिस्थितियां दिशा के आत्महत्या करने या दुर्घटनावश इमारत से गिरने की ओर संकेत करती थीं।
सरकार की ओर से यह भी कहा गया कि शुरुआती एडीआर अक्टूबर 2020 में ही बंद कर दी गई थी। बाद में सोशल मीडिया पर जांच को लेकर उठे सवालों के कारण इसे दोबारा खोला गया। लेकिन आगे की जांच में भी हत्या के आरोप में किसी को अभियोजित करने के लिए पर्याप्त मजबूत सबूत नहीं मिले।
दिशा के पिता की याचिका में शिवसेना (उद्धव ठाकरे) नेता आदित्य ठाकरे समेत कुछ लोगों के नाम भी उठाए गए थे। ठाकरे की ओर से वरिष्ठ अधिवक्ता सुदीप पसबोला ने याचिका का विरोध किया और इसे राजनीतिक रूप से प्रेरित कार्यवाही बताया।
हालांकि, अदालत ने सुनवाई के दौरान साफ किया था कि उसका ध्यान राजनीतिक आरोप-प्रत्यारोप पर नहीं, बल्कि जांच की वैधानिक प्रक्रिया पर है। कोर्ट ने कहा था कि एक पिता ने अपनी बेटी को खोया है और उसका यह अधिकार है कि उसकी मौत की जांच कानून के मुताबिक हो तथा परिवार को मामले में उचित निष्कर्ष मिले।
(जनचौक ब्यूरो)